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सस्पेंस से भरी साजिश! 7 लाख की सुपारी, सरकारी नौकरी और करोड़ों की संपत्ति... क्या इसी लालच में बेटी ने रची मां की मौत की पटकथा?

 


जयपुर: राजस्थान की राजधानी जयपुर में सामने आए एक सनसनीखेज हत्याकांड ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है। जिस रिश्ते को दुनिया सबसे पवित्र मानती है, उसी रिश्ते पर लालच और साजिश का ऐसा दाग लगा है, जिसने हर किसी को हैरान कर दिया। आरोप है कि 23 वर्षीय आरुषी शर्मा ने अपनी ही मां नीरज शर्मा की हत्या करवाने के लिए 7 लाख रुपये की सुपारी दी। पुलिस की जांच में अब ऐसे कई चौंकाने वाले खुलासे सामने आ रहे हैं, जिनसे इस मामले की परतें लगातार खुल रही हैं।

जांच एजेंसियों के अनुसार, यह सिर्फ एक हत्या नहीं थी, बल्कि कई दिनों तक चली सुनियोजित साजिश का परिणाम थी। पुलिस का दावा है कि आरोपी बेटी का मकसद सरकारी नौकरी हासिल करना और परिवार की करोड़ों रुपये की संपत्ति पर अकेले अधिकार जमाना था।

सरकारी नौकरी के लिए रची गई मौत की साजिश

पुलिस के अनुसार, आरुषी शर्मा के पिता जयपुर कोर्ट में लोअर डिवीजन क्लर्क (LDC) के पद पर कार्यरत थे। लगभग एक वर्ष पहले उनकी मृत्यु हो गई थी। पिता की मौत के बाद परिवार को अनुकंपा नियुक्ति का लाभ मिलने का अवसर था।

बताया जा रहा है कि उस समय आरुषी केवल 12वीं पास थी और नौकरी की पात्रता को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं थी। वहीं परिवार की जिम्मेदारी और 16 वर्षीय दिव्यांग बेटे की देखभाल को देखते हुए यह अनुकंपा नियुक्ति मां नीरज शर्मा को दे दी गई।

जांच में सामने आया है कि आरुषी इसी नौकरी को स्वयं हासिल करना चाहती थी। पुलिस का मानना है कि इसी लालच ने उसे अपनी मां के खिलाफ खतरनाक साजिश रचने के लिए प्रेरित किया।

क्या भाई भी था साजिश का निशाना?

मामले की जांच कर रही पुलिस के अनुसार, हत्या की साजिश केवल मां तक सीमित नहीं थी। सीसीटीवी फुटेज और अन्य इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों के आधार पर जांचकर्ताओं का दावा है कि आरोपी अपने 16 वर्षीय दिव्यांग भाई को भी रास्ते से हटाना चाहती थी।

पुलिस का कहना है कि यदि मां और भाई दोनों की मौत हो जाती, तो आरुषी परिवार की संपत्ति की अकेली उत्तराधिकारी बन सकती थी। हालांकि इस पहलू की जांच अभी जारी है और पुलिस सभी उपलब्ध साक्ष्यों की जांच कर रही है।

पहली कोशिश—घर में जिंदा जलाने की योजना

पुलिस रिपोर्ट के अनुसार, 27 जून की दोपहर कथित तौर पर हत्या की पहली कोशिश की गई।

जांच में सामने आया है कि पहले आरोपी घर से बाहर चली गई। इसके बाद किसी व्यक्ति के माध्यम से घर की सीढ़ियों पर बंधा हुआ नारियल फेंकवाया गया, ताकि नीरज शर्मा बाहर निकलें। इसके कुछ समय बाद कपड़ों में आग लगाकर एक जलता हुआ गोला घर की ओर फेंका गया।

पुलिस का दावा है कि इस घटना का वीडियो और अन्य डिजिटल साक्ष्य उनके कब्जे में हैं। हालांकि इस प्रयास में मां और बेटा सुरक्षित बच गए।

दूसरी बार भी नहीं हुई कामयाबी

पहली कोशिश असफल होने के बाद कथित तौर पर जून महीने में एक और योजना बनाई गई।

पुलिस के अनुसार, इस बार किराए की थार गाड़ी से सड़क दुर्घटना कराने की कोशिश हुई। लेकिन नीरज शर्मा इस घटना में भी बच गईं। लगातार दो असफल प्रयासों के बाद आरोपियों ने तीसरी बार अधिक सुनियोजित योजना बनाई।

तीसरी बार 130 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार बनी मौत

पुलिस जांच के मुताबिक 4 जुलाई को नीरज शर्मा अपने दिव्यांग बेटे को ट्यूशन छोड़कर वापस लौट रही थीं। इसी दौरान पहले से रेकी कर रहे आरोपियों ने तेज रफ्तार स्कॉर्पियो से उनकी गाड़ी को टक्कर मार दी।

जांच अधिकारियों का दावा है कि स्कॉर्पियो की रफ्तार करीब 130 किलोमीटर प्रति घंटे थी। इस भीषण टक्कर में नीरज शर्मा की मौत हो गई।

पुलिस के अनुसार, इस वारदात को अंजाम देने वाले आरोपी का संबंध भरतपुर से है। जांच में यह भी सामने आया है कि कथित रूप से उसे हत्या के लिए करीब 7 लाख रुपये अग्रिम भुगतान किया गया था।

सीसीटीवी फुटेज बने सबसे बड़े सबूत

इस मामले की जांच में सीसीटीवी फुटेज, मोबाइल लोकेशन, कॉल रिकॉर्ड, डिजिटल ट्रांजैक्शन और अन्य इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों की महत्वपूर्ण भूमिका बताई जा रही है।

पुलिस का कहना है कि विभिन्न स्थानों से मिले वीडियो फुटेज ने पूरी साजिश की कड़ियों को जोड़ने में मदद की है। इन्हीं सबूतों के आधार पर कई अहम खुलासे हुए हैं।

जांच एजेंसियां अब यह भी पता लगाने में जुटी हैं कि इस पूरी साजिश में और कौन-कौन लोग शामिल थे तथा किसकी क्या भूमिका रही।

आखिर कौन सी सरकारी नौकरी थी?

जिस नौकरी को लेकर यह पूरा मामला चर्चा में है, वह राजस्थान न्यायालय प्रणाली में लोअर डिवीजन क्लर्क (LDC) की अनुकंपा नियुक्ति से जुड़ा पद है।

अनुकंपा नियुक्ति का उद्देश्य किसी सरकारी कर्मचारी की सेवा के दौरान मृत्यु होने पर उसके आश्रित परिवार को आर्थिक सहारा देना होता है। सामान्य परिस्थितियों में पात्र आश्रित को निर्धारित नियमों के अनुसार नौकरी दी जाती है ताकि परिवार की आजीविका प्रभावित न हो।

पिता की मृत्यु के बाद यही नियुक्ति नीरज शर्मा को मिली थी।

LDC की कितनी होती है सैलरी?

राजस्थान हाई कोर्ट एवं अधीनस्थ न्यायालयों में लोअर डिवीजन क्लर्क (LDC) का पद पे मैट्रिक्स लेवल-5 के अंतर्गत आता है।

प्रोबेशन अवधि के दौरान कर्मचारियों को निर्धारित मानदेय दिया जाता है, जबकि स्थायी नियुक्ति के बाद वेतन में उल्लेखनीय वृद्धि होती है। सामान्य परिस्थितियों में नियमित LDC कर्मचारियों की इन-हैंड सैलरी लगभग 33 हजार से 40 हजार रुपये प्रतिमाह तक हो सकती है। वहीं अनुकंपा नियुक्ति और सेवा की स्थिति के अनुसार शुरुआती मासिक आय इससे अलग हो सकती है।

पुलिस का मानना है कि इसी नौकरी और उससे जुड़ी आर्थिक सुरक्षा ने आरोपी के मन में लालच पैदा किया।

पूरे शहर में चर्चा का विषय बना मामला

जयपुर का यह मामला केवल एक हत्या नहीं, बल्कि पारिवारिक रिश्तों में विश्वास, लालच और अपराध के खतरनाक मेल का उदाहरण बन गया है। जिस मां ने अपने बच्चों की परवरिश और भविष्य के लिए जिम्मेदारी उठाई, उसी पर जानलेवा हमला कराने के आरोप ने समाज को झकझोर दिया है।

पुलिस लगातार मामले की गहन जांच कर रही है। अधिकारियों का कहना है कि इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य, वित्तीय लेनदेन, कॉल डिटेल रिकॉर्ड और अन्य तकनीकी पहलुओं की जांच के बाद चार्जशीट को और मजबूत बनाया जाएगा। यदि जांच में और लोगों की संलिप्तता सामने आती है तो उनके खिलाफ भी कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

नोट: यह समाचार पुलिस जांच और अब तक सामने आए आधिकारिक दावों पर आधारित है। मामले की न्यायिक प्रक्रिया जारी है और अंतिम सत्य अदालत के निर्णय के बाद ही स्थापित होगा।

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